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आलेख : कब तक झेलते रहेंगे हम कॉल ड्रॉप? - मोहनदास पई

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सुप्रीम कोर्ट ने कॉल ड्रॉप पर ट्राई के नियमन को मनमाना, अपारदर्शी व गैरवाजिब ठहराते हुए खारिज कर दिया। इस तरह कहीं न कहीं उपभोक्ता हितों को नुकसान और दूरसंचार कंपनियों को राहत मिली है। कॉल ड्रॉप की समस्या अब भी जारी है, जो उपभोक्ताओं की असंतुष्टि का कारण बनी हुई है। दूरसंचार कंपनियों ने अपनी तरफ से बताया कि पिछले 25 महीनों में उन्होंने दो लाख से ज्यादा 2जी और 3जी के साइट्स इंस्टाल किए हैं। उनकी नजर में कॉल ड्रॉप की समस्या स्पेक्ट्रम की उपलब्धता और समय से मोबाइल टॉवरों को लगाने की इजाजत पर निर्भर करती है। इस समस्या का समाधान सुनिश्चित करने के लिए ही उन पर जुर्माना लगाने का विकल्प सुझाया गया था।
अगर टेलीकॉम कंपनियां जिम्मेदारी से काम कर रही हैं तो उन्हें ऑप्टिमाइजिंग सॉफ्टवेयर और दूसरे तकनीकी समाधान के इस्तेमाल से किसने रोका? किसने उन्हें कहा कि वे स्पेक्ट्रम की उपलब्धता से ज्यादा कनेक्शन बेचें? किसने कहा कि वे और ज्यादा डाटा कनेक्शन बेचें, जबकि यह तो उन्हें भी मालूम था कि उन्हें जितना स्पेक्ट्रम मुहैया कराया गया है वह अतिरिक्त बोझ बर्दाश्त नहीं कर सकता और इसका असर स्वाभाविक रूप से कॉल सेवाओं पर पड़ेगा?
टेलीकॉम कंपनियों द्वारा लाइसेंस की शर्तों में ढिलाई, खराब सेवाएं देने और उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ाने के बाद ट्राई के पास सिवा इसके कोई विकल्प नहीं था कि वह लोगों के साथ विस्तृत सलाह-मशविरे के बाद नए नियमन के साथ सामने आए। टेलीकॉम कंपनियों ने अपने बचाव में एक दलील यह भी दी कि उन्हें काफी घाटा हो रहा है। अगर ये कंपनियां अपने लिए धन की व्यवस्था नहीं कर पा रहीं तो इसका नुकसान वे उपभोक्ताओं के मत्थे कैसे डाल सकती हैं? इन कंपनियों का जो भी वित्तीय ढांचा है, वह पूरी तरह उनके नियंत्रण में है। एक कंपनी ने तो अफ्रीका में भारी निवेश के साथ अपने पांव पसारे, लेकिन उसे खासा घाटा उठाना पड़ा। आखिर उसके इस घाटे को उसके उपभोक्ता क्यों उठाएं और वह भी तब जब अफ्रीकी प्रोजेक्ट से पहले देश में उनका धंधा खासे फायदे में चल रहा था? ऐसे ही एक और कंपनी ने नए अधिग्रहण के लिए तो बड़े भुगतान किए, पर अपने नेटवर्क को सुधारने और उसका विस्तार करने पर खर्च करने में हाथ तंग कर लिए। तमाम टेलीकॉम कंपनियां ग्राहकों को भरोसेमंद सेवाएं देने के बुनियादी तकाजे को पूरा करने में असफल रही हैं।
अच्छी सेवा ग्राहकों का अधिकार है। जब हमारे अधिकारों की परवाह नहीं की जाए तो हम जरूर यह मांग करेंगे कि नियामक संस्था मामले को देखे और अच्छी सेवा के लिए एक बेहतर रास्ता निकाले। कॉल ड्रॉप मामले में ट्राई ने यही करने की कोशिश की, क्योंकि उसकी जिम्मेदारी बनती थी कि वह उपभोक्ता हितों को सुरक्षित करे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि नए नियमन द्वारा टेलीकॉम कंपनियों के बुनियादी अधिकारों की अवहेलना होती है, लेकिन क्या उपभोक्ताओं के कोई मौलिक अधिकार नहीं? क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उपभोक्ताओं के अधिकारों से समझौता नहीं हुआ? इस पूरे प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने कहीं न कहीं एक संकीर्ण रुख अख्तियार किया और उपभोक्ता हित, लोकहित और लोक-कानून की परवाह नहीं की। फैसला कहीं न कहीं इस बात पर टिका है कि प्रति कॉल ड्रॉप पर एक रुपए के जुर्माने का गणित कैसे सामने आया? किस आधार पर जुर्माने के लिए अधिकतम तीन कॉल ड्रॉप की सीमा तय की गई? फैसले के अनुसार नियामक संस्था ने इस मामले को देखने में पूर्ण बुद्धिमत्ता का परिचय नहीं दिया और जुर्माना लगाने का उसका फैसला अविवेकपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल यह भी उठाया कि कॉल ड्रॉप के लिए टेली कंपनियों को ही सौ फीसद जिम्मेदार ठहरना कितना उचित है, जबकि 36.9 फीसद ऐसा उपभोक्ताओं की चूक की वजह से होता है।
कॉल ड्रॉप पर जुर्माने के जरिए ट्राई कहीं न कहीं कंपनियों को इसके लिए बाध्य कर रही थी कि वे अपनी सेवाओं को दुरुस्त करने के लिए अपना निवेश बढ़ाएं। क्या अब तक जो भी सुधार हुआ, उसे ये कंपनियां जुर्माने के भय के बिना करतीं? जुर्माने को तीन कॉल तक सीमित करने का मतलब यह था कि ज्यादा कॉल करने वाले उपभोक्ताओं को भी कहीं न कहीं नुकसान सहना पड़ेगा। साफ है कि पूरा बोझ अकेले कंपनियों पर नहीं डाला गया था। इसमें उपभोक्ता भी शरीक थे और इस आधार पर ट्राई के फैसले को एकतरफा या अविवेकपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता। ट्राई को इस मामले में जनता का भारी गुस्सा झेलना पड़ा था कि कॉल ड्रॉप को लेकर टेली कंपनियां उनके खिलाफ ज्यादती कर रही हैं। यहां तक कि 3जी डाटा सर्विस भी वादे से कम स्पीड पर लोगों को मिल रही है।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे अहम मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता हितों की तो परवाह नहीं, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों को राहत जरूर दे दी। यह फैसला उस मकसद को कहीं न कहीं कमजोर करता है जिसके लिए ट्राई जैसी नियामक संस्था को बनाने का फैसला संसद ने किया था। दूसंचार सेक्टर के सुदृढ़ विकास को तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, जब तक टेलीफोन कंपनियों पर एक तरह का अंकुश न रखा जाए। खराब सेवाओं और उपभोक्ता हितों की अनदेखी से यह सेक्टर सही दिशा में प्रगति नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर पुनर्विचार का अनुरोध कहीं से अनुचित नहीं है, क्योंकि सौ करोड़ भारतीयों के लिए वह एक बुरा दिन था, जब उनके हितों के खिलाफ फैसला आया। हमें सेवा की गुणवत्ता, स्वीकार्य सेवाओं के पारदर्शी मानक और कसूरवार कंपनियों को कठघरे में लाने के सैद्धांतिक उपभोक्ता तकाजों के लिए एकजुट होना ही होगा।