मथुरा : जवाहरबाग कांड के मुखिया रामवृक्ष यादव को लेकर जयगुरुदेव के दो शिष्य गुटों के बीच तलवारें खिंच गई हैं। पुराने शिष्य उमाकांत तिवारी गुट ने रविवार को कहा कि रामवृक्ष और जयगुरुदेव के उत्तराधिकारी पंकज की जुगलबंदी थी। जवाहरबाग पर कब्जा इनकी साजिश का हिस्सा था। इसमें उप्र सरकार का समर्थन था। मामले की सीबीआइ जांच होनी चाहिए। वहीं जय गुरुदेव के उत्तराधिकारी पंकज के पक्ष का कहना है कि ऐसे आरोप लगाने वालों का मुखिया ही भगोड़ा है। वैसे रामवृक्ष नक्सली था, हम आध्यात्मिक लोग हैं। उससे हमारा कोई लेना-देना नहीं था।
18 मई 2012 को जय गुरुदेव के निधन के बाद उत्तराधिकारी को लेकर घमासान हुआ था। एक तरफ उनके शिष्य उमाकांत तिवारी का दावा था, तो दूसरी तरफ गुरुदेव के साथ रहने वाले पंकज थे। बाद में पंकज उत्तराधिकारी बने और उज्जैन चले गए। वहां जयगुरुदेव के नाम से आश्रम बनाया।
इधर, जवाहरबाग ऑपरेशन में मारे गए कथित सत्याग्रहियों के नेता रामवृक्ष यादव के नेटवर्क को लेकर सवार उठे। रामवृक्ष ने अप्रैल 2014 में जवाहरबाग पर कब्जा जमाने के बाद अपनी मांगों को लेकर कोर्ट की शरण ली। उसने जयगुरुदेव के निधन की सत्यता पर सवाल उठाने के साथ मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की मांग गी, तब से ही ये माना जा रहा था कि रामवृक्ष यादव को जयगुरुदेव आश्रम के विरोधी गुट का समर्थन प्राप्त है।
'जागरणÓ ने मामले में उमाकांत तिवारी गुट से संपर्क किया। उनके प्रवक्ता रमाकांत पांडेय ने कहा कि जवाहरबाग में रामवृक्ष को ठहराने के पीछे पंकज का सहयोग रहा है। पांडेय ने कहा कि जय गुरुदेव आश्रम प्रकरण और जवाहर बाग कांड, दोनों की सीबीआइ जांच होनी चाहिए। वहीं उनका जवाब देते हुए जयगुरुदेव संस्था के प्रबंधक चरन ङ्क्षसह एडवोकेट ने इन बातों को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि हम तो रामवृक्ष को जानते तक नहीं हैं।